नवरात्रि पांचवां दिन: स्कंदमाता की कथा, स्वरूप और पूजा विधि
बच्चों की सलामती के लिए हर माँ जितनी बेचैन रहती है, नवरात्रि पांचवां दिन ठीक उसी भाव को समर्पित है। इस दिन नवदुर्गा के पंचम स्वरूप स्कंदमाता की पूजा होती है, और स्कंदमाता कथा सुनना इस दिन की सबसे प्रिय परंपराओं में गिना जाता है। संतान-सुख, बुद्धि और आरोग्य से जुड़ी यह देवी जितनी ममतामयी दिखती हैं, उनकी कथा उतनी ही प्रेरक भी है। आगे इस लेख में स्कंदमाता कथा, उनका स्वरूप, मंत्र, शुभ रंग और आसान स्कंदमाता पूजा विधि — सब कुछ क्रम से जानेंगे।
नवरात्रि पांचवां दिन: स्कंदमाता कौन हैं?
“स्कंद” यानी भगवान कार्तिकेय, और उन्हीं की माता होने के नाते देवी का यह नाम पड़ा — स्कंदमाता। नवरात्रि पांचवां दिन नवदुर्गा के इसी पांचवें रूप की आराधना के लिए तय किया गया है। संतान-प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपती और अपने बच्चों की भलाई चाहने वाले माता-पिता, दोनों के लिए यह दिन खास महत्व रखता है — भक्तों का मानना है कि इस उपासना से बच्चों को लंबी उम्र और सुरक्षा का आशीर्वाद मिलता है।
स्कंदमाता कथा — एक माँ का बलिदान और साहस
माँ पार्वती ने अपने पुत्र कार्तिकेय को युद्ध के लिए सक्षम और शक्तिशाली बनाने के इरादे से ही स्कंदमाता का रूप धारण किया था — यही स्कंदमाता कथा की जड़ है। दरअसल तारकासुर नाम के एक अत्याचारी राक्षस ने तीनों लोकों में उत्पात मचा रखा था, और भविष्यवाणी के अनुसार उसका अंत केवल शिवपुत्र कार्तिकेय के हाथों ही लिखा था। इसी वजह से देवी के इस स्वरूप में बाल कार्तिकेय हमेशा उनकी गोद में विराजमान नजर आते हैं। एक तरफ ममता, दूसरी तरफ असुर-संहार का संकल्प — स्कंदमाता कथा असल में इन्हीं दो भावों को एक साथ समेटती है।
देवी का स्वरूप और उनकी सवारी
कमल के आसन पर विराजमान होने के कारण देवी को “पद्मासना” भी कहा जाता है, और सिंह को उनका वाहन बताया गया है। चार भुजाओं में से एक हाथ में बाल कार्तिकेय गोद में बैठे रहते हैं, एक हाथ आशीर्वाद की अभय-मुद्रा में उठा रहता है, जबकि बाकी दोनों हाथों में कमल के फूल नजर आते हैं। तीन नेत्रों वाला यह स्वरूप देखने में जितना शांत लगता है, भीतर से उतना ही दृढ़ भी है। एक भ्रम यहां आम है — कई जगह मोर को भी देवी की सवारी बता दिया जाता है, जबकि असल में मोर तो उनके पुत्र कार्तिकेय का वाहन है; ज्यादातर विश्वसनीय स्रोत सिंह वाले स्वरूप को ही प्रामाणिक मानते हैं।
स्कंदमाता पूजा विधि — सरल तरीका
पूजा की शुरुआत चौकी पर देवी की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करने से होती है — गंगाजल से चौकी को शुद्ध कर लें और सफेद या हल्के रंग के फूल अर्पित करें। धूप-दीप दिखाने के बाद स्कंदमाता कथा सुनना या पढ़ना अगला जरूरी चरण है, फिर मंत्र-जाप के साथ आरती करके स्कंदमाता पूजा विधि पूरी होती है। भोग की बात करें तो केले या दूध से बनी मिठाई, खासकर खीर, इस दिन खासतौर पर चढ़ाई जाती है — संतान-सुख से जुड़ी उनकी कृपा को इसी भोग से जोड़कर देखा जाता है।
मंत्र और शुभ्र रंग का महत्व
“ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः” — यह मंत्र स्कंदमाता की आराधना में सबसे प्रचलित है, और भक्त पूरे दिन इसे जपते रहते हैं। रंगों की बात करें तो शुभ्र यानी सफेद रंग देवी से जुड़ा माना जाता है, इसलिए नवरात्रि पांचवां दिन आते ही कई घरों में सफेद या हल्के रंग के वस्त्र पहनने का चलन दिख जाता है। हमारे अनुभव में इस दिन काफी भक्त माँ दुर्गा की मूर्ति के लिए भी हल्के, सफेद रंग की पोशाक ही तलाशते हैं — हमारी दुर्गा जी पोशाक कलेक्शन में ऐसे कुछ डिज़ाइन मौजूद हैं।
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इस पूजा से भक्तों को क्या मिलता है?
बुध ग्रह के साथ देवी का सीधा नाता बताया जाता है, इसी वजह से बुद्धि, तर्कशक्ति और बातचीत के कौशल पर इस पूजा का असर माना जाता है। साहस और समझदारी, दोनों साथ लेकर चलने का यही संदेश स्कंदमाता कथा में भी छुपा है। जो दंपती संतान-सुख की कामना रखते हैं, उनके लिए भी यह व्रत खासतौर पर फलदायी बताया गया है। बेशक हर भक्त का अनुभव और श्रद्धा का स्तर अलग होता है — यहां जो लाभ गिनाए गए हैं, वे पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं पर आधारित हैं, इन्हें किसी वैज्ञानिक तथ्य की तरह न लें।
स्कंदमाता कथा से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
यहां कुछ सवाल दिए गए हैं जो भक्त अक्सर स्कंदमाता कथा और पूजा को लेकर पूछते हैं।
नवरात्रि पांचवां दिन कौन-सी देवी को समर्पित है?
यह दिन नवदुर्गा के पांचवें स्वरूप, स्कंदमाता को समर्पित है।
स्कंदमाता की सवारी कौन-सी है?
सिंह को उनका वाहन माना जाता है, और वे कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं।
पूजा में कौन-सा मंत्र जपा जाता है?
“ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः” — यही मंत्र सबसे ज्यादा प्रचलित है।
देवी का शुभ रंग कौन-सा बताया गया है?
शुभ्र यानी सफेद रंग देवी से जोड़कर देखा जाता है।
भोग में क्या चढ़ाना ठीक रहता है?
केले या दूध से बनी मिठाई, खासकर खीर, इस दिन के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
निष्कर्ष
एक माँ अपने बच्चे के लिए कितनी दूर तक जा सकती है — स्कंदमाता कथा असल में यही दिखाती है। इस नवरात्रि पांचवां दिन जब आप पूजा के लिए बैठें, तो सिर्फ रीति-रिवाज नहीं, इस कहानी के पीछे छुपे भाव को भी याद रखिएगा।
अधिक जानकारी के लिए हिंदी विकिपीडिया पर स्कंदमाता का पेज भी देखा जा सकता है।