देव उठनी एकादशी 2026: तिथि, महत्व और पूजा विधि
साल के कुछ दिन ऐसे होते हैं जिनका इंतज़ार पूरा घर करता है — देव उठनी एकादशी इन्हीं में से एक है। चार महीने से रुके हुए मांगलिक कार्यों का रास्ता इसी दिन खुलता है, और यही वजह है कि इस तारीख़ को लेकर हर साल इतनी पूछताछ रहती है। आइए जानते हैं ये पर्व असल में क्या है, और इसे कैसे मनाया जाता है।
तिथि: 20 नवंबर 2026 (शुक्रवार) — कार्तिक शुक्ल एकादशी
व्रत पारण: 21 नवंबर 2026 (शनिवार), सुबह से दोपहर के बीच — सटीक समय शहर अनुसार बदलता है
ध्यान दें: पंचांग अनुसार सटीक समय आपके शहर के अनुसार थोड़ा बदल सकता है — स्थानीय पंचांग से एक बार जरूर मिला लें। (डिस्क्लेमर पढ़ें)
देव उठनी एकादशी आखिर है क्या?
सीधी भाषा में कहें तो ये वो दिन है जब भगवान विष्णु को चार महीने की योगनिद्रा से जगाया जाता है। इसे प्रबोधिनी एकादशी या देव प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं — “प्रबोधिनी” शब्द का मतलब ही होता है जगाने वाली। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली ये एकादशी उस लंबे विश्राम-काल का अंत मानी जाती है जो आषाढ़ माह की देवशयनी एकादशी से शुरू होता है। (विस्तृत जानकारी के लिए देवउठनी एकादशी का विकिपीडिया पृष्ठ भी देखा जा सकता है।)
चार महीने की नींद वाली मान्यता कहां से आई?
पौराणिक मान्यता के अनुसार देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर विश्राम करने चले जाते हैं, और सृष्टि का संचालन इस दौरान कुछ समय के लिए शिव जी संभालते हैं। यही चार महीने चातुर्मास कहलाते हैं। देव उठनी एकादशी पर जब विष्णु जी जागते हैं, तभी से उनका कार्यभार वापस शुरू होता है — और इसी के साथ घर-घर में भी एक नई शुरुआत का माहौल बनता है।
इसी दिन से शादियों का मौसम क्यों शुरू हो जाता है?
चातुर्मास के चार महीनों में शादी, मुंडन, गृह-प्रवेश जैसे मांगलिक काम करना वर्जित माना जाता है, क्योंकि इस दौरान विष्णु जी विश्राम में होते हैं और उनके आशीर्वाद के बिना कोई भी शुभ कार्य अधूरा समझा जाता है। देव उठनी एकादशी पर जैसे ही भगवान जागते हैं, यही रोक अपने आप हट जाती है — और यही वजह है कि नवंबर-दिसंबर में अचानक शादियों की धूम दिखने लगती है। (इसी के अगले दिन, द्वादशी तिथि को, तुलसी विवाह अलग से मनाया जाता है — वो अपने आप में एक अलग परंपरा है।)
घर पर पूजा विधि कैसे करें?
देव उठनी एकादशी की पूजा विधि ज़्यादातर घरों में शाम से ही शुरू हो जाती है — आंगन या पूजा स्थान पर गन्नों से एक छोटा मंडप सजाया जाता है, और उसके बीच चौक बनाकर वहां भगवान विष्णु या ठाकुर जी की प्रतिमा स्थापित की जाती है। चौक के पास भगवान के पैरों के निशान बनाकर उन्हें हल्के कपड़े से ढक दिया जाता है, मानो भगवान अभी विश्राम में ही हों। सिंघाड़ा, गन्ना, मौसमी फल और मिठाई का भोग अर्पित किया जाता है, और घी का एक दीया रातभर जलता रहता है। अगली सुबह उन्हीं पैरों के निशान की पूजा करके, शंख और घंटी बजाते हुए भगवान को स्पर्श से जगाया जाता है — और यहीं व्रत कथा भी सुनाई-पढ़ी जाती है।
ठाकुर जी की सेवा में इस दिन क्या अलग करें?
चूंकि ये दिन जागने और नई शुरुआत का है, कई भक्त इसी मौके पर अपने लड्डू गोपाल या ठाकुर जी को ताज़ा श्रृंगार और नई पोशाक पहनाना पसंद करते हैं — हालांकि ये कोई सख्त नियम नहीं, बस एक स्वाभाविक भावना है कि जागने के साथ-साथ रूप भी नया हो। अगर आप भी इस दिन अपने ठाकुर जी के लिए कुछ नया चुनना चाहें, तो हमारी लड्डू गोपाल पोशाक कलेक्शन में सर्दियों के मौसम के हिसाब से कई विकल्प मिल जाएंगे।
व्रत पारण में किन बातों का ध्यान रखें?
देव उठनी एकादशी का पारण हमेशा द्वादशी तिथि के दौरान, सूर्योदय के बाद ही करना चाहिए — एकादशी तिथि खत्म होने से पहले व्रत खोलना उचित नहीं माना जाता। इस साल पारण 21 नवंबर 2026 (शनिवार) को सुबह से दोपहर के बीच करना उपयुक्त रहेगा; अपने शहर के अनुसार सटीक समय पंचांग से एक बार ज़रूर देख लें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
देव उठनी एकादशी कब है?
देव उठनी एकादशी 2026 में 20 नवंबर, शुक्रवार को है। हर साल तारीख़ कार्तिक मास के पंचांग के अनुसार बदलती है, तो अगले साल के लिए ऊपर दिए गए info-box में अपडेटेड तारीख़ देख सकते हैं।
देव उठनी एकादशी को देव उठानी ग्यारस भी क्यों कहा जाता है?
एकादशी का मतलब ही ग्यारहवीं तिथि होता है, इसलिए बोलचाल में इसे “ग्यारस” भी कहा जाता है — दोनों नाम एक ही पर्व के लिए इस्तेमाल होते हैं।
क्या इस दिन व्रत रखना ज़रूरी है?
ज़रूरी नहीं, कई भक्त सिर्फ पूजा-अर्चना करते हैं बिना व्रत के — व्रत रखना या न रखना व्यक्तिगत श्रद्धा और सेहत पर निर्भर करता है।
क्या तुलसी विवाह और देव उठनी एकादशी एक ही दिन होते हैं?
नहीं, दोनों अलग-अलग दिन मनाए जाते हैं — तुलसी विवाह आमतौर पर देव उठनी एकादशी के अगले दिन, द्वादशी तिथि को होता है।
गन्ने के मंडप का क्या महत्व है?
गन्ना इस मौसम की नई फसल का प्रतीक माना जाता है, इसलिए भगवान को जगाने की पूजा में इसे शामिल करना एक पुरानी परंपरा है।
देव उठनी एकादशी असल में एक नई शुरुआत का संकेत है — चार महीने के ठहराव के बाद घर में फिर से मांगलिक रौनक लौट आती है। चाहे आप पूरी विधि से पूजा करें या सिर्फ दीया जलाकर भगवान को याद करें, भाव सबसे ज़्यादा मायने रखता है। दिवाली के पांच दिनों की पूरी जानकारी के लिए हमारी भाई दूज गाइड भी देख सकते हैं, जो इसी त्योहार-श्रृंखला का हिस्सा है।