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छठ पूजा 2026: चार दिन की विधि, कथा और Best तैयारी

छठ पूजा

छठ पूजा को बाकी व्रतों से अलग इसीलिए माना जाता है कि इसमें सिर्फ़ एक दिन नहीं, पूरे चार दिन लगातार तपस्या जैसी कठिनाई निभाई जाती है — और वह भी घर की चार दीवारी में नहीं, बल्कि नदी या तालाब के ठंडे पानी में खड़े होकर। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल की यह महान परंपरा अब देश भर में फैल चुकी है। नीचे छठ पूजा की सही तारीख़, चार दिनों की पूरी विधि और छठी मैया की कथा दी गई है।

नहाय खाय: 13 नवंबर 2026 (शुक्रवार)

खरना: 14 नवंबर 2026 (शनिवार)

संध्या अर्घ्य (डूबते सूर्य को): 15 नवंबर 2026 (रविवार), शाम लगभग 5:58 बजे

उषा अर्घ्य (उगते सूर्य को): 16 नवंबर 2026 (सोमवार), सुबह लगभग 6:50 बजे

कुछ स्रोत इन तारीख़ों में 1 दिन का अंतर भी बताते हैं, इसलिए अपने क्षेत्र (बिहार/झारखंड/पूर्वी यूपी) के पंचांग से पुष्टि कर लें। (डिस्क्लेमर पढ़ें)

छठ पूजा क्या है और कार्तिक महीने में ही क्यों मनाई जाती है?

कार्तिक महीने में सूर्य अपनी नीच राशि में होते हैं, ऐसा शास्त्रों में बताया गया है, और शायद इसी वजह से साल के इसी महीने सूर्य देव की सबसे बड़ी आराधना रखी गई — जिसमें उनकी बहन छठी मैया की पूजा भी उतने ही भाव से साथ-साथ होती है। परिवार की खुशहाली, बच्चों की सलामती और कुंडली में सूर्य को मज़बूत करने की चाहत में महिलाएं यह कठिन व्रत रखती आई हैं, हालांकि आजकल कई घरों में पुरुष भी इसे उतनी ही निष्ठा से निभाते हैं। (छठ पूजा के बारे में और पढ़ें)

छठ पूजा के चार दिन — पूरी विधि

पहला दिन नहाय खाय का होता है, जब व्रती स्नान करके घर की सफ़ाई के बाद सिर्फ़ एक समय कद्दू-भात जैसा सात्विक भोजन करते हैं। दूसरे दिन खरना आता है, जिसमें दिन भर निर्जला उपवास रखने के बाद शाम को गुड़ वाली खीर और रोटी का प्रसाद बनाकर ग्रहण किया जाता है — यहीं से असली 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है। तीसरे दिन परिवार सहित नदी या तालाब के किनारे जाकर डूबते सूर्य को संध्या अर्घ्य दिया जाता है, और चौथे व आख़िरी दिन उसी घाट पर सुबह-सुबह उगते सूर्य को उषा अर्घ्य देकर व्रत का पारण होता है।

छठी मैया की कथा संक्षेप में

राजा प्रियंवद और रानी मालिनी की कथा इस पर्व से सबसे ज़्यादा जोड़ी जाती है। संतान न होने की पीड़ा से दुखी इस राजा-रानी की कहानी में आगे चलकर देवी प्रकट होती हैं, जिन्हें छठी मैया माना जाता है, और उनकी कृपा से ही यह व्रत परंपरा शुरू हुई बताई जाती है। कथा के पूरे ब्यौरे क्षेत्र-दर-क्षेत्र अलग मिलते हैं — हमारी सलाह यही रहेगी कि आप अपने परिवार में प्रचलित पूरी कथा को ही उतनी ही श्रद्धा से सुनें, जितनी अब तक सुनते आए हैं।

छठ पूजा में ठेकुआ और सूप-दउरा का क्या महत्व है?

ठेकुआ इस पर्व का सबसे पहचाना जाने वाला प्रसाद है — गेहूं के आटे और गुड़ से बनाकर घी में तला जाता है, और हर अर्घ्य की टोकरी में इसका होना लगभग अनिवार्य माना जाता है। फल, ठेकुआ और बाकी प्रसाद बांस से बने पारंपरिक सूप या दउरा में सजाकर ही घाट तक ले जाया जाता है, जो इस पूजा की सबसे पहचानी जाने वाली तस्वीर है।

छठ पूजा पर ध्यान रखने योग्य बातें

36 घंटे का निर्जला व्रत और घंटों ठंडे पानी में खड़े रहना, दोनों ही शरीर के लिए कठिन परीक्षा है। बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाएं या किसी बीमारी से जूझ रहे लोग व्रत की कठोरता में ढील रखें तो यह भी उतना ही सच्चा माना जाएगा — छठी मैया भाव देखती हैं, शरीर को तकलीफ़ में डालने की ज़िद नहीं। घाट पर भीड़ और फिसलन भरी सीढ़ियों का भी ध्यान रखना ज़रूरी है, खासकर बच्चों और बुज़ुर्गों के साथ।

इस महीने आगे यह भी पढ़ें: छठ पूजा खत्म होने के कुछ ही दिन बाद देव उठनी एकादशी और उसके अगले दिन तुलसी विवाह आता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

छठ पूजा 2026 कब है?

छठ पूजा 2026 में 13 से 16 नवंबर तक चार दिन मनाई जाती है, मुख्य संध्या अर्घ्य 15 नवंबर, रविवार को है।

क्या छठ का व्रत सिर्फ़ महिलाएं ही रख सकती हैं?

परंपरागत रूप से यह व्रत ज़्यादातर महिलाएं रखती रही हैं, पर आज कई पुरुष भी संतान और परिवार की भलाई के लिए यह व्रत उतनी ही निष्ठा से रखते हैं।

अगर घर के पास नदी या तालाब न हो तो क्या करें?

कई शहरों में अब सामुदायिक छठ घाट या कृत्रिम तालाब बनाए जाते हैं, और कुछ परिवार घर की छत या आंगन में बड़े टब में पानी भरकर भी अर्घ्य की विधि पूरी करते हैं।

खरना के दिन क्या खाया जाता है?

खरना की शाम गुड़ वाली खीर और रोटी का प्रसाद बनाया जाता है, जिसे पूरा परिवार मिलकर ग्रहण करता है, और उसके बाद अगले 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।

छठ पूजा की असली ताक़त उसकी कठिनाई में नहीं, बल्कि उस सामूहिक भाव में है जब पूरा परिवार, पूरा मोहल्ला एक साथ घाट पर खड़ा होकर सूर्य देव को अर्घ्य देता है। इस साल अगर आप पहली बार यह व्रत देख या निभा रहे हों, तो बस याद रखिएगा — यहाँ भीड़ भी उतनी ही अपनी लगती है जितना परिवार।

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