देव दीपावली 2026: कार्तिक पूर्णिमा की तारीख़, कथा और Best महत्व
देव दीपावली को कार्तिक महीने की सबसे चमकीली रात कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा — यह वही रात है जब वाराणसी के गंगा घाट लाखों मिट्टी के दीयों से जगमगा उठते हैं। यह पर्व हमारी छठ पूजा के कुछ ही दिन बाद, कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है। नीचे देव दीपावली की सही तारीख़, इसके पीछे की कथा और घर पर मनाने का तरीका दिया गया है।
तिथि: 24 नवंबर 2026 (मंगलवार), कार्तिक पूर्णिमा
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 23 नवंबर, रात लगभग 11:42 बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त: 24 नवंबर, रात लगभग 8:23 बजे
प्रदोष मुहूर्त (दीपदान का समय): शाम लगभग 5:08 बजे से 7:47 बजे तक
कुछ पंचांग 23 नवंबर को भी मुख्य तिथि बताते हैं, इसलिए व्रत-स्नान से पहले अपने शहर के पंचांग से पुष्टि कर लें। (डिस्क्लेमर पढ़ें)
देव दीपावली और त्रिपुरारी पूर्णिमा नाम का क्या मतलब है?
इस पूर्णिमा को त्रिपुरारी पूर्णिमा भी इसीलिए कहा जाता है, क्योंकि इससे जुड़ी एक कथा में भगवान शिव इसी रात त्रिपुरासुर नाम के असुर का अंत करते हैं। उस जीत की ख़बर जब देवलोक पहुंची, तो देवता खुद काशी उतर आए और पूरे नगर को दीपों से सजा दिया — कहा जाता है कि उसी याद में आज भी हर साल यहां दीप जलाए जाते हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि कुछ स्रोत इस रात को “देवताओं का अपना उत्सव” बताते हैं तो कुछ इसे सीधे शिव की विजय से जोड़ते हैं — मूल कथा दोनों में एक ही है, बस ज़ोर अलग-अलग जगह दिया गया है। (कार्तिक पूर्णिमा के बारे में और पढ़ें)
देव दीपावली पर वाराणसी के घाट क्यों जगमगाते हैं?
मान्यता है कि इस रात स्वयं देवता काशी के घाटों पर उतरकर स्नान करते हैं, और भक्त उनके स्वागत में हर सीढ़ी पर दीये सजाते हैं। गंगा में पवित्र डुबकी लगाने के बाद शाम ढलते ही दशाश्वमेध से लेकर अस्सी घाट तक पूरा किनारा दीयों की रोशनी से नहा उठता है — यह नज़ारा अब इतना मशहूर हो चुका है कि देश-विदेश से लोग सिर्फ़ इसे देखने वाराणसी पहुंचते हैं।
कार्तिक पूर्णिमा को और किन वजहों से खास माना जाता है?
यह सिर्फ़ एक कथा वाली रात नहीं है। भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार की जयंती भी इसी दिन मानी जाती है, जिसमें उन्होंने जलप्रलय से जीवसृष्टि को बचाया था। कुछ क्षेत्रों में तुलसी विवाह भी इसी पूर्णिमा को संपन्न किया जाता है, हालांकि हमारी तुलसी विवाह वाली पोस्ट में बताई गई देव उठनी एकादशी के अगले दिन वाली परंपरा ज़्यादा प्रचलित है। और सिख धर्म में तो यही दिन गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व के तौर पर पूरी दुनिया में मनाया जाता है — एक ही चांद की रात, कई अलग-अलग आस्थाओं के लिए उतनी ही पवित्र।
घर पर देव दीपावली कैसे मनाएं?
हर कोई वाराणसी नहीं पहुंच सकता, और इसकी ज़रूरत भी नहीं — घर पर भी यह पर्व उतनी ही श्रद्धा से मनाया जा सकता है। शाम को स्नान के बाद तुलसी के पास और मुख्य द्वार पर दीये जलाना, घर में गंगाजल छिड़कना और संभव हो तो किसी नदी/तालाब किनारे दीपदान करना — यही सामान्य विधि है। हमने देखा है कि कई भक्त इस मौके पर अपने घर के मंदिर को भी नए सिरे से सजाते हैं, और मिट्टी या पीतल के दीयों की मांग इन दिनों खासी बढ़ जाती है — ऐसे दीये हमारी Pooja Items श्रेणी में भी मिल जाएंगे।
ध्यान रखने योग्य बातें
अगर वाराणसी जाने की योजना बना रहे हैं, तो यह याद रखना ज़रूरी है कि इस रात घाटों पर भारी भीड़ होती है — बुज़ुर्गों और बच्चों के साथ जा रहे हों तो समय से पहले पहुंचना और फिसलन भरी सीढ़ियों से सावधान रहना बेहतर रहेगा। घर पर दीये जलाते समय भी हवा में पर्दे या सूखी सजावट के पास खुली लौ न रखें, यह छोटी सी सावधानी बड़े हादसे से बचा सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
देव दीपावली 2026 कब है?
देव दीपावली 2026 में 24 नवंबर, मंगलवार को है, कार्तिक पूर्णिमा के दिन।
क्या देव दीपावली और देव उठनी एकादशी एक ही दिन हैं?
नहीं, दोनों अलग दिन हैं। देव उठनी एकादशी कार्तिक महीने की ग्यारहवीं तिथि को आती है, और देव दीपावली उसी महीने की पूर्णिमा यानी पंद्रहवीं तिथि को, लगभग 4 दिन बाद।
क्या देव दीपावली मनाने के लिए वाराणसी जाना ज़रूरी है?
बिल्कुल नहीं। घर पर दीप जलाकर, गंगाजल छिड़ककर और परिवार के साथ पूजा करके भी यह पर्व उतनी ही श्रद्धा से मनाया जा सकता है।
देव दीपावली की रोशनी सिर्फ़ एक नज़ारा नहीं, बल्कि इस पूरे महीने भर चले त्योहारों के सिलसिले का एक खूबसूरत समापन है। इस साल जब आप दीया जलाएं, तो याद रखिएगा — यह रोशनी सिर्फ़ अंधेरा दूर नहीं करती, एक पूरे महीने की भक्ति का उजाला भी समेटे हुए है।
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